यमुना की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक के मिले कण, स्वास्थ्य के लिए बन रहीं खतरा
- टेरी के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्ययन में भी हुई पुष्टि
- हरियाणा की तुलना में दिल्ली के पानी में मिला अधिक प्रदूषण
डिजिटल डेस्क । दूषित हो रही यमुना का पानी का जलीय जीव जन्तु के साथ ही मानव जीवन के लिए खतरा बन सकता है। हाल के हुए शोध में यमुना के पानी में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिलने की पुष्टि हुई है। दूषित हो रही यमुना में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ रही है। पिछले वर्ष द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के अध्ययन में यह बात सामने आई थी। हाल में ही डीयू के शोधकर्ताओं द्वारा यमुना में मिलने वाली मछलियों पर किए गए अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि हुई है। हरियाणा की तुलना में राजधानी में यमुना में विभिन्न स्थानों पर मिलने वाली मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा अधिक मिली है। यानी यहां की मछली खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस तरह की मछली खाने या पानी पीने से हार्मोनल असंतुलन, पाचन तंत्र में सूजन और कोशिकीय क्षति जैसी समस्याएं हो सकती हैं। प्लास्टिक पर चिपके जहरीले रसायन शरीर में पहुंचकर गंभीर बीमारियां पैदा कर सकते हैं।
हरियाणा के यमुनानगर और करनाल, तथा दिल्ली के सूर घाट व सोनिया विहार में 12 प्रजातियों की कुल 220 मछलियों का विश्लेषण किया गया। इनमें 1678 माइक्रोप्लास्टिक के कण यानी प्रति मछली औसतन लगभग 7.6 कण मिले हैं। टेरी के शोधकर्ताओं ने वर्ष 2024-25 में अलग-अलग मौसम में दिल्ली में विभिन्न जगहों से नमूने लेकर उसकी जांच की थी। बीते वर्ष के अंत में दिल्ली सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार यमुना जल में माइक्राप्लास्टिक की मात्रा मौसम के अनुसार बदलती रहती है। मानसून में पानी का बहाव बढ़ने पर माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा ज्यादा रहती है। मानसून के बाद यह कम हो जाती है, क्योंकि यह गंदगी व प्लास्टिक आसपास की मिट्टी में फैल जाती है। डीयू के शोधार्थियों ने भी हरियाणा और दिल्ली में चार स्थानों पर यमुना में मिलने वाली मछली पर अध्ययन किया है। माइक्रोप्लास्टिक पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के कण होते। ये कण पानी में मिले रहते हैं और दिखाई भी नहीं देते। इस पानी को पीया जाता है, तो यह कण अपने साथ जहरीले रसायनों को चिपका कर शरीर के अंदर ले जाते हैं। यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होता है।
यहां की मछलियों में है सबसे अधिक माइक्रोप्लास्टिक ः
- मछलियों से मिले कुल माइक्रोप्लास्टिक में 77.8 प्रतिशत हिस्सा कपड़ों और धागों के सूक्ष्म रेशों का था। इसका मुख्य स्रोत सिंथेटिक कपड़े, घरेलू धुलाई, टेक्सटाइल उद्योग और अपशिष्ट जल का बहाव है।
- सोनिया विहार में 20 मछलियों में 436 माइक्रोप्लास्टिक कण मिले, जो प्रति मछली औसतन 21.8 कण हैं। सूर घाट में तिलपिया व सोनिया विहार की रोहू मछली में औसतन 10.25 कण पाए गए। सबसे कम प्रदूषण करनाल की नीडल फिश में औसतन 3.7 कण मिले।
- सबसे अधिक 751 माइक्रोप्लास्टिक कण मछलियों के पाचन तंत्र में मिले। गलफड़ों में 605 कण और मांसपेशियों में 322 कण मिले हैं। इस तरह से मछली के खाए जाने वाले हिस्से में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण मौजूद हैं।