प्लास्टिक मल्चिंग से राहत की उम्मीद, जापान की सस्टेनेबल मल्चिंग शीट का सीएसए में होगा परीक्षण

- जापान की ओजेआई संस्था द्वारा तैयार शीट कानपुर पहुंची, यूपी के किसानों के खेतों में परीक्षण की तैयारी, पानी की बचत और खरपतवार नियंत्रण समेत कई संभावित फायदे
रवि शर्मा, कानपुर : खेती में प्लास्टिक मल्चिंग शीट के इस्तेमाल से जुड़ी दिक्कतों को कम करने की दिशा में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर ने एक नई पहल की है। जापान की ओजेआई संस्था द्वारा तैयार सस्टेनेबल मल्चिंग शीट विश्वविद्यालय पहुंच चुकी है। अब इसके इस्तेमाल और प्रभाव का परीक्षण उत्तर प्रदेश के किसानों के खेतों में किए जाने की तैयारी है। सीएसए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव गुप्ता के मुताबिक इस तकनीक को किसानों की जरूरतों और मौजूदा कृषि चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए देखा जा रहा है। उनका कहना है कि परीक्षण के परिणाम सकारात्मक रहने पर इस तकनीक को व्यापक स्तर पर किसानों तक पहुंचाने की दिशा में काम किया जाएगा।
प्लास्टिक मल्चिंग का विकल्प बनने की उम्मीद :
फसलों के आसपास नमी बनाए रखने, खरपतवार को नियंत्रित करने और सिंचाई की जरूरत कम करने के लिए किसान प्लास्टिक मल्चिंग शीट का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, फसल चक्र पूरा होने के बाद प्लास्टिक शीट को खेत से हटाना और उसका निस्तारण किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। सस्टेनेबल मल्चिंग शीट को इसी समस्या के संभावित समाधान के तौर पर देखा जा रहा है। विश्वविद्यालय के मुताबिक निर्धारित अवधि के बाद यह शीट प्राकृतिक रूप से विघटित होकर मिट्टी में मिल सकती है, जिससे इसे खेत से हटाने की जरूरत कम हो सकती है।
खरपतवार नियंत्रण और पानी की बचत का दावा :
सीएसए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव गुप्ता के अनुसार सस्टेनेबल मल्चिंग शीट के इस्तेमाल से फसल के आसपास खरपतवार की वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। साथ ही मिट्टी में नमी बनाए रखने के कारण सिंचाई की आवश्यकता भी कम होने की संभावना है। गर्मी के मौसम में जब तापमान काफी अधिक हो जाता है, तब मल्चिंग शीट फसल की जड़ों के आसपास की मिट्टी को सीधे तेज धूप के प्रभाव से बचाने में मदद कर सकती है। वहीं बारिश के दौरान पानी के मिट्टी तक पहुंचने की प्रक्रिया को भी नियंत्रित करने में यह उपयोगी हो सकती है। हालांकि, इन सभी प्रभावों की वास्तविक उपयोगिता और लागत-लाभ का आकलन उत्तर प्रदेश में होने वाले परीक्षणों के बाद ही अधिक स्पष्ट होगा।
करीब 30 हजार रुपये प्रति एकड़ खर्च का अनुमान :
प्रो. संजीव गुप्ता के अनुसार सस्टेनेबल मल्चिंग शीट के इस्तेमाल पर किसानों को करीब 30 हजार रुपये प्रति एकड़ खर्च करना पड़ सकता है। विश्वविद्यालय का मानना है कि इस लागत को केवल शीट की कीमत के आधार पर नहीं बल्कि खरपतवार नियंत्रण, सिंचाई और इस्तेमाल के बाद शीट हटाने की लागत समेत कुल कृषि खर्च के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यदि परीक्षणों में तकनीक प्रभावी और आर्थिक रूप से व्यवहारिक साबित होती है, तो किसानों के लिए यह पारंपरिक प्लास्टिक मल्चिंग के मुकाबले एक वैकल्पिक व्यवस्था बन सकती है।
पहले यूपी में परीक्षण, फिर देशभर में विस्तार की योजना :
सीएसए विश्वविद्यालय के स्तर पर फिलहाल इस तकनीक को उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच परीक्षण के लिए आगे बढ़ाने की तैयारी है। परीक्षण के दौरान फसल, मिट्टी, पानी की आवश्यकता, खरपतवार नियंत्रण, शीट के टिकाऊपन और इसके प्राकृतिक रूप से विघटित होने जैसे पहलुओं का आकलन किया जाएगा। विश्वविद्यालय का उद्देश्य परीक्षण के परिणामों के आधार पर यह पता लगाना है कि यह तकनीक अलग-अलग कृषि परिस्थितियों में किसानों के लिए कितनी उपयोगी और किफायती साबित हो सकती है। परिणाम अनुकूल रहने पर इसे देश के अन्य हिस्सों में भी किसानों तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं।