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रुपया का खेल है भईया… स्वीकृत सिटिंग लेआउट से छेड़छाड़ कर बढ़ रहीं छह से 10 सीटें, यात्रियों की सुरक्षा से खिलवाड़

रुपया का खेल है भईया… स्वीकृत सिटिंग लेआउट से छेड़छाड़ कर बढ़ रहीं छह से 10 सीटें, यात्रियों की सुरक्षा से खिलवाड़
  • स्वीकृत सिटिंग लेआउट से छेड़छाड़ कर बढ़ाई जा रही क्षमता, डबल डेकर में पांच की जगह छह स्लीपर तक लगाने का आरोप
  • इमरजेंसी गेट और यात्रियों के आवागमन की जगह भी हो रही प्रभावित, आरटीओ और ट्रैफिक पुलिस की जांच पर उठे सवाल

डिजिटल डेस्क, दिल्ली एनसीआर: अधिक कमाई के लालच में लांग रूट और रोजमर्रा की आवाजाही में इस्तेमाल होने वाली बसों में स्वीकृत क्षमता से अधिक सीटें लगाने का खेल चलने का आरोप है। सिंगल और डबल डेकर बसों के मूल सिटिंग लेआउट में बदलाव कर कहीं छह तो कहीं 10 तक अतिरिक्त सीटें लगाई जा रही हैं। इससे बस संचालक स्वीकृत यात्री क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाकर अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि सीटें बढ़ाने के दौरान बस के अंदर यात्रियों के आवागमन और आपात स्थिति में बाहर निकलने की व्यवस्था भी प्रभावित होने की आशंका है।

जानकारों के मुताबिक, बस का सिटिंग लेआउट वाहन की स्वीकृत डिजाइन और क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसमें बदलाव केवल सीटें बढ़ाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीटों के बीच उपलब्ध जगह, गलियारे, मुख्य दरवाजे और आपातकालीन निकास की स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में किसी दुर्घटना या आग जैसी आपात स्थिति में यात्रियों के सुरक्षित बाहर निकलने में परेशानी हो सकती है।

डबल डेकर में स्लीपर बढ़ाने का आरोप

डबल डेकर बसों में पांच सीट वाले स्लीपर लेआउट को बदलकर छह सीट तक लगाने की शिकायत सामने आ रही है। इसके अलावा बस के आगे और पीछे निर्धारित डिजाइन से अलग अतिरिक्त स्लीपर लगाए जाने का आरोप है। इससे बस में स्वीकृत क्षमता से अधिक यात्रियों को ले जाने की व्यवस्था तैयार हो जाती है।

इसी तरह सिंगल डेकर बसों में आगे की तरफ चार और पीछे की ओर छह तक अतिरिक्त सीटें लगाने की बात सामने आई है। सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए मूल लेआउट में बदलाव किए जाने से यात्रियों के बैठने के साथ-साथ आने-जाने के लिए उपलब्ध स्थान भी कम हो सकता है।

इमरजेंसी गेट के सामने सीटें लगाने का आरोप

सबसे गंभीर आरोप यह है कि कुछ बसों में अतिरिक्त सीट लगाने के दौरान कंपनी की ओर से उपलब्ध कराए गए आपातकालीन निकास के सामने भी सीटें लगा दी जाती हैं। यदि ऐसा है तो दुर्घटना की स्थिति में यात्रियों के लिए वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है।

यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से बस की जांच के दौरान केवल फिटनेस प्रमाणपत्र और सामान्य तकनीकी स्थिति देखना पर्याप्त नहीं है। स्वीकृत यात्री क्षमता और वास्तविक सिटिंग लेआउट का भी मिलान जरूरी है। यदि किसी बस में स्वीकृत डिजाइन से अलग सीटें या स्लीपर लगाए गए हैं तो उनकी वैध स्वीकृति की भी जांच होनी चाहिए।

आरटीओ को इन बिंदुओं पर करनी चाहिए जांच

  • बस के पंजीकरण प्रमाणपत्र में दर्ज स्वीकृत यात्री क्षमता और वास्तविक सीटों का मिलान।
  • वाहन के टाइप अप्रूवल और बस बाडी प्रमाणपत्र में स्वीकृत सिटिंग लेआउट की जांच।
  • एजेंसी से तैयार होकर निकली बस और वर्तमान बस के सिटिंग लेआउट में अंतर की जांच।
  • अतिरिक्त सीट या स्लीपर लगाए जाने पर उसकी वैध स्वीकृति और दस्तावेजों की जांच।
  • इमरजेंसी एग्जिट, मुख्य दरवाजे और यात्रियों के आवागमन के रास्ते की स्थिति की जांच।
  • सीट बढ़ाने के लिए बस की बाडी अथवा संरचना में किए गए बदलावों की जांच।
  • स्वीकृत क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाने या ले जाने की स्थिति में नियमानुसार कार्रवाई।

जांच में सामने आ सकती है वास्तविक स्थिति

बसों में सीट बढ़ाने के आरोपों की वास्तविक स्थिति मौके पर भौतिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। इसके लिए परिवहन विभाग को बस के पंजीकरण और स्वीकृत लेआउट का मौके पर मौजूद सीटों से मिलान करना होगा। यदि स्वीकृत डिजाइन से अलग सीटें लगाई गई हैं तो यह भी देखा जाना जरूरी है कि इसके लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति ली गई है या नहीं।

यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस की नियमित जांच में इस पहलू को भी शामिल किए जाने की जरूरत है। केवल दस्तावेजों की जांच के बजाय बस के वास्तविक सिटिंग लेआउट, आपातकालीन निकास और यात्री क्षमता की जांच से नियमों के विपरीत किए गए बदलावों की पहचान की जा सकती है।