रामप्रकाश श्रीवास्तव, संवाददाता
कानपुर देहात। कस्बा शिवली समेत आसपास क्षेत्र में नाग पंचमी का त्यौहार धूमधाम के साथ मनाया गया। सावन महीने की शुक्ल पंचमी नागपंचमी कहलाती है इस दिन नागों की पूजा की जाती है पूरे सावन महीने ने विशेषकर नागपंचमी को धरती खोदना निषिद्ध है। एक दिन व्रत करके सांपों खीर खिलाई वह दूध पिलाया जाता है कहीं-कहीं सावन मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी मनाई जाती है इस दिन सफेद कमल पूजा में रखा जाता है।नागपंचमी पर्व पर बच्चों एवं युवक युवतियों ने गुड़िया पीटने के तालाबों नहर व पांडव नदी में स्नान किया। भारतीय संस्कृति में नाग पूजा का विशेष महत्व है हमारे देश में नाग पूजा आदिकाल से चली आ रही है श्रावण मास की शुक्ल पंचमी के दिन नाग पंचमी का पर्व श्रद्धा एवं विश्वास के साथ मनाया जाता है। मानव सभ्यता के आरंभ से ही शरद के प्रति भय की भावना व्याप्त रही है इन्हें शक्ति एवं सूर्य का अवतार भी माना जाता है ऐसा विश्वास है कि हमारी धरती शेषनाग के फनों के ऊपर टिकी है जब कभी पाप धरती पर बढ़ता है तो शेषनाग अपने फनों को समझते हैं और धरती डगमगाने लगती है। यही विश्वास जनमानस में और अधिक श्रद्धा नत होकर नाग पूजा को बाध्य करता है। हमारे देश के प्रत्येक भाग में किसी न किसी रूप में भगवान शंकर की पूजा होती है उनकी जटाओं गले एवं भुजाओं पर नाग की माला स्पष्ट देखी जा सकती है। अर्थवेद में पांच सांपों के नाम का उल्लेख है जो दिशाओं के आधार व वायुमंडल के रक्षक बताए जाते हैं इस प्रकार नाग देश कालचक्र में अपने अलग-अलग परिवेश में प्रकृति ने रेंगने वाले जंतुओं का भंडार सजा रखा है जिसको मानव देव रूप में मानकर आज तक पूज्यते चले जा रहे हैं सोमवार को नागपंचमी के पर्व पर सुबह से ही छोटे छोटे बच्चों के बीच खासा उत्साह नजर आया।लड़कियों द्वारा बनाई गई गुड़िया को लड़कों द्वारा पीटा गया। गुड़िया पीटने के बाद बच्चों ने स्नान किया।

