यूपी की सियासत में Gen-Z की एंट्री! 2027 में युवा वोटर तय करेंगे सत्ता का समीकरण, भागवत से राहुल तक बढ़ी सक्रियता

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रवि शर्मा लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां भले ही अभी शुरुआती दौर में हों, लेकिन सियासी दलों ने वोटरों के उस वर्ग पर नजरें गड़ा दी हैं, जो आने वाले चुनाव में कई सीटों का समीकरण बदल सकता है। यह वर्ग है Gen-Z यानी नई युवा पीढ़ी और पहली बार मतदान करने वाले युवा।

रोजगार, सरकारी भर्तियां, प्रतियोगी परीक्षाएं, पेपर लीक, शिक्षा, महंगाई और भविष्य के अवसर जैसे मुद्दे इस पीढ़ी के लिए अहम हैं। यही वजह है कि बीजेपी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत अलग-अलग राजनीतिक खेमे युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश में जुटे हैं। हालिया घटनाक्रम इस बदलती राजनीतिक रणनीति की तस्वीर भी दिखाते हैं। एक तरफ RSS प्रमुख मोहन भागवत ने Gen-Z और Gen-Alpha के युवाओं के साथ संवाद किया, तो दूसरी तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रयागराज में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के जरिए छात्रों और युवाओं से सीधा संवाद किया।

पहले भागवत ने कहा- युवाओं से संवाद जरूरी

6 अगस्त को मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में मोहन भागवत ने Gen-Z और Gen-Alpha के युवाओं के साथ संवाद किया। कार्यक्रम से पहले ही यह चर्चा शुरू हो गई थी कि संघ प्रमुख सीधे नई पीढ़ी के युवाओं से बातचीत करने जा रहे हैं। इसके बाद भागवत ने Gen-Z को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अगर सरकार पहले ही Gen-Z से बातचीत कर लेती तो आंदोलन इतना आगे नहीं बढ़ता। उन्होंने युवाओं के प्रदर्शन को संवाद का एक तरीका बताते हुए कहा कि युवाओं की बात सुनी जानी चाहिए। भागवत ने Gen-Z को लेकर भरोसा जताते हुए इसे पिछली पीढ़ियों की तुलना में ज्यादा ईमानदार और देशभक्त पीढ़ी बताया। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शन करने वाले युवाओं को राष्ट्रविरोधी नजरिए से देखना उचित नहीं है। यही वजह है कि भागवत का यह संवाद सिर्फ एक युवा कार्यक्रम तक सीमित नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषक इसे संघ की नई पीढ़ी तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर भी देख रहे हैं। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भागवत ने सीधे तौर पर कहा कि वह युवाओं से ‘संघ के बारे में’ बात करेंगे। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उनका जोर युवाओं से संवाद और उनकी बात सुनने पर था।

राहुल गांधी ने प्रयागराज में Gen-Z को साधा

मोहन भागवत के कार्यक्रम के कुछ ही दिन बाद कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रयागराज में छात्रों और युवाओं के बीच पहुंचकर अपनी राजनीतिक रणनीति का संकेत दिया। 8 अगस्त को प्रयागराज के KP इंटर कॉलेज ग्राउंड में कांग्रेस की ओर से ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। राहुल गांधी ने इस मंच से युवाओं की समस्याओं और उनके भविष्य से जुड़े सवालों को उठाया। कार्यक्रम से पहले कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर भी युवाओं को जोड़ने के लिए अभियान चलाया।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में युवाओं को देश की बड़ी ताकत बताते हुए रोजगार, शिक्षा और आर्थिक अवसरों से जुड़े सवाल उठाए। उनके भाषण का फोकस ‘दर्द, डेटा और दौलत’ जैसे मुद्दों पर रहा। कांग्रेस के लिए प्रयागराज का यह कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में अपना संगठन मजबूत करने और युवाओं के बीच राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

अखिलेश यादव भी रोजगार और भर्ती के मुद्दे पर हमलावर

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव लंबे समय से युवाओं के रोजगार और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों को बीजेपी सरकार के खिलाफ प्रमुख हथियार बनाते रहे हैं। अखिलेश यादव ने अलग-अलग मौकों पर सरकार पर युवाओं को पर्याप्त रोजगार नहीं देने का आरोप लगाया है। 2026 में उन्होंने सरकारी भर्तियों, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को लेकर सरकार को घेरा। सपा की रणनीति में रोजगार और शिक्षा के मुद्दे को अपने सामाजिक समीकरण के साथ जोड़ना अहम है। पार्टी सोशल मीडिया के जरिए भी युवा मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश कर रही है।

बीजेपी की नजर भी युवा वोट बैंक पर

दूसरी तरफ बीजेपी के लिए 2027 में युवा वोटर बेहद महत्वपूर्ण होंगे। पार्टी सरकार की उपलब्धियों, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, कानून-व्यवस्था और रोजगार के अवसरों को युवाओं के बीच प्रमुख मुद्दे के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है। बीजेपी की चुनौती यह है कि नई पीढ़ी तक राजनीतिक संदेश सिर्फ रैलियों और भाषणों के जरिए नहीं पहुंचता।Instagram, YouTube, Facebook और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म युवाओं की राजनीतिक सोच बनाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

करीब 15 फीसदी Gen-Z वोटर का अनुमान कितना अहम?

राजनीतिक चर्चाओं में यूपी में Gen-Z की हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी तक होने का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि, यह आंकड़ा अंतिम आधिकारिक मतदाता सूची का प्रमाणित आंकड़ा नहीं है। इसलिए इसे राजनीतिक विश्लेषण के अनुमान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। फिर भी युवा मतदाताओं की संख्या इतनी बड़ी है कि उनका सामूहिक रुख कई विधानसभा सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी कई सीटों पर जीत-हार का अंतर काफी कम रहा था। ऐसे में अगर युवा वोट किसी एक राजनीतिक दल की ओर थोड़ा भी अधिक झुकता है तो करीबी मुकाबले वाली सीटों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।

2027 में कौन-सा मुद्दा बनेगा निर्णायक?

यूपी का युवा वोटर अब सिर्फ जातीय या पारंपरिक राजनीतिक पहचान के आधार पर मतदान करेगा या रोजगार और भविष्य जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देगा, यह 2027 की सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली होगी। बीजेपी विकास, कानून-व्यवस्था और सरकार के काम को लेकर युवाओं के बीच जाएगी। सपा रोजगार, भर्ती, परीक्षा और शिक्षा के मुद्दों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश करेगी। कांग्रेस राहुल गांधी के जरिए युवाओं और छात्रों से सीधे संवाद का मॉडल आगे बढ़ा सकती है। वहीं RSS की ओर से Gen-Z के साथ सीधे संवाद की पहल यह संकेत देती है कि नई पीढ़ी अब केवल राजनीतिक दलों के लिए ही नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के लिए भी महत्वपूर्ण हो चुकी है।

सोशल मीडिया पर भी होगी बड़ी लड़ाई

Gen-Z को साधने के लिए 2027 का चुनाव जमीन के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी लड़ा जाएगा। छोटे वीडियो, मीम, लाइव संवाद, डिजिटल कैंपेन और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के जरिए राजनीतिक दल युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश करेंगे। युवा जिस मुद्दे को सोशल मीडिया पर तेजी से उठाते हैं, वह कुछ ही समय में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है। ऐसे में पार्टियों के लिए सिर्फ युवाओं तक पहुंचना काफी नहीं होगा, बल्कि उनकी समस्याओं पर विश्वसनीय जवाब देना भी जरूरी होगा।

भागवत से राहुल तक—युवा क्यों बने केंद्र?

मोहन भागवत का Gen-Z के साथ संवाद और युवाओं के प्रदर्शन को लेकर उनका सकारात्मक रुख, उसके बाद राहुल गांधी का प्रयागराज में छात्रों के बीच पहुंचना और अखिलेश यादव का रोजगार व भर्ती के मुद्दों पर लगातार सरकार को घेरना—इन घटनाक्रमों को एक साथ देखें तो संकेत साफ है। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में युवा वोटर अब सिर्फ एक वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण का संभावित निर्णायक फैक्टर बन चुका है। अब असली मुकाबला यह होगा कि कौन-सी पार्टी युवाओं के सवालों को सबसे बेहतर तरीके से समझती है, कौन उन्हें भरोसेमंद जवाब देती है और कौन-सा राजनीतिक नैरेटिव Gen-Z को मतदान केंद्र तक खींचने में कामयाब होता है।

यानी 2027 में यूपी की सत्ता की चाबी सिर्फ जातीय समीकरणों में नहीं, बल्कि युवा मतदाताओं की सोच में भी छिपी हो सकती है।

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