‘वंदे मातरम्’ कब लिखा गया, पहली बार किसने गाया और राष्ट्रीय गीत कैसे बना? जानिए पूरी कहानी

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रवि शर्मा, नई दिल्ली: “वंदे मातरम्” भारत के इतिहास का सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ राष्ट्रीय गीत है। इसकी पंक्तियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे लोगों में राष्ट्रीय चेतना और मातृभूमि के प्रति भाव पैदा किया। यही वजह है कि आजादी के बाद भी इसे भारत की राष्ट्रीय पहचान के महत्वपूर्ण प्रतीकों में स्थान मिला। “वंदे मातरम्” के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय थे। 2025 में इस रचना के 150 वर्ष पूरे हुए। इसका पहला प्रकाशन 7 नवंबर 1875 को बंकिम चंद्र द्वारा प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में हुआ था। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’, जो 1882 में प्रकाशित हुआ, में शामिल किया गया।

कौन थे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय?

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय 19वीं सदी के प्रमुख बंगाली साहित्यकारों में गिने जाते हैं। उन्हें बंगाली साहित्य में ‘साहित्य सम्राट’ के नाम से भी जाना जाता है। वे उपन्यासकार, कवि, निबंधकार और पत्रकार होने के साथ-साथ ब्रिटिश शासन में सरकारी अधिकारी भी रहे। उनका जन्म 26 जून 1838 को बंगाल के कांठालपाड़ा (कांतलपाड़ा), नैहाटी क्षेत्र, वर्तमान पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम यादवचंद्र चट्टोपाध्याय और माता का नाम दुर्गादेवी था। उनके पिता ब्रिटिश सरकार की सेवा में थे और आगे चलकर डिप्टी कलेक्टर बने। उनकी जन्मतिथि को कुछ स्रोतों में 27 जून 1838 भी लिखा गया है।

कहां हुई पढ़ाई?

बंकिम चंद्र की शुरुआती शिक्षा के बाद उनका दाखिला हुगली मोहसिन कॉलेज में हुआ। इसके बाद 1856 में उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता में पढ़ाई शुरू की। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय की शुरुआती पीढ़ी के स्नातकों में शामिल थे। विश्वविद्यालय की शुरुआती बीए परीक्षा में बंकिम चंद्र और जादुनाथ बोस सफल होने वाले दो विद्यार्थियों में शामिल थे। बाद में उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की और 1869 में कानून की डिग्री हासिल की।

सरकारी नौकरी भी की

पढ़ाई पूरी करने के बाद बंकिम चंद्र ब्रिटिश भारतीय प्रशासन में शामिल हुए। उन्होंने डिप्टी कलेक्टर और डिप्टी मजिस्ट्रेट के रूप में लंबे समय तक सरकारी सेवा की। यानी एक तरफ वे ब्रिटिश सरकार की नौकरी कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर उनकी साहित्यिक रचनाओं में भारतीय समाज, संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना के विषय लगातार दिखाई देते रहे। वे 1891 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए।

वंदे मातरम् कब और क्यों लिखा गया?

‘वंदे मातरम्’ की रचना को लेकर इतिहास में अलग-अलग विवरण मिलते हैं, लेकिन वर्तमान सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार इसकी रचना और पहला प्रकाशन 1875 से जुड़ा है। भारत सरकार के 150 वर्ष के आधिकारिक विवरण के अनुसार, बंकिम चंद्र ने 7 नवंबर 1875 को ‘वंदे मातरम्’ की रचना की और उसी दिन यह साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। बाद में उन्होंने इसे अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया। इसका मूल भाव मातृभूमि के प्रति सम्मान और समर्पण है। ‘वंदे मातरम्’ का सामान्य अर्थ “मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं” या “माता को नमन” के रूप में समझा जाता है। गीत में मातृभूमि को प्रकृति, हरियाली, जल, फसल और समृद्धि के रूप में चित्रित किया गया है। इस तरह देश को ‘मां’ के रूप में देखने की भावना को काव्यात्मक रूप दिया गया।

क्या इसे अंग्रेजों के खिलाफ लिखे गए आंदोलनकारी गीत के रूप में ही बनाया गया था?

आज ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े प्रतीकों में माना जाता है, लेकिन इसे लिखे जाने के समय 1875 में इसका राजनीतिक प्रभाव आज के अर्थ में स्थापित नहीं था। बाद के दशकों में यह स्वतंत्रता आंदोलन का शक्तिशाली नारा और गीत बना। प्रधानमंत्री कार्यालय और भारत सरकार के आधिकारिक विवरणों में भी बताया गया है कि 1875 में रचना के बाद 1882 में इसे ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया और आगे चलकर इसने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘आनंदमठ’ से कैसे जुड़ा वंदे मातरम्?

बंकिम चंद्र का प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ 1882 में प्रकाशित हुआ। इसमें ‘वंदे मातरम्’ को शामिल किया गया। उपन्यास की पृष्ठभूमि 18वीं सदी के बंगाल के संन्यासी विद्रोह से जुड़ी है। इसी साहित्यिक संदर्भ के कारण आगे चलकर ‘वंदे मातरम्’ और स्वतंत्रता संघर्ष के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित हुआ। महत्वपूर्ण बात यह है कि गीत पहले रचा गया था और बाद में ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। इसलिए यह कहना कि बंकिम चंद्र ने ‘आनंदमठ’ लिखते समय ही पहली बार यह गीत बनाया था, पूरी तरह सटीक नहीं होगा।

पहली बार सार्वजनिक रूप से किसने गाया?

‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन के राजनीतिक मंच पर बड़ी पहचान 1896 में मिली। रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ गाया। इसके बाद कांग्रेस के विभिन्न आयोजनों में यह गीत लोकप्रिय होता गया और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका बढ़ती गई। यहीं से ‘वंदे मातरम्’ साहित्य की सीमाओं से बाहर निकलकर सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने लगा।

बंगाल विभाजन और वंदे मातरम् आंदोलन का बड़ा नारा बना

1905 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया। इसके विरोध में चले स्वदेशी आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ सबसे प्रभावशाली नारों और गीतों में शामिल हो गया। 1905 के बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन में बड़ी संख्या में लोगों ने ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष किया। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रीय एकता और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। ब्रिटिश शासन के दौरान इस नारे और गीत के इस्तेमाल पर कई जगह कार्रवाई भी हुई। स्वतंत्रता सेनानियों के बीच ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष साहस और प्रतिरोध की पहचान बन गया।

विदेशों में भी पहुंचा वंदे मातरम्

‘वंदे मातरम्’ का प्रभाव भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। 1907 में भीकाजी कामा ने स्टुटगार्ट में भारतीय ध्वज फहराया था और उस ध्वज पर ‘वंदे मातरम्’ शब्द लिखे गए थे। यह घटना विदेशों में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीकों के प्रसार का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसके अलावा विदेशों में रहने वाले भारतीय क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादियों ने भी ‘वंदे मातरम्’ को अपने आंदोलनों और प्रकाशनों में इस्तेमाल किया।

24 जनवरी 1950 को क्या फैसला हुआ?

भारत के संविधान लागू होने से ठीक पहले 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठकों में राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय हुआ। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ को भारत का राष्ट्रीय गान माना जाएगा और ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, को ‘जन गण मन’ के समान सम्मान और समान दर्जा दिया जाएगा।

वंदे मातरम् और जन गण मन में अंतर

दोनों राष्ट्रीय महत्व के गीत हैं, लेकिन उनकी संवैधानिक स्थिति अलग शब्दों में निर्धारित हुई। ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रीय गान है। ‘वंदे मातरम्’ भारत का राष्ट्रीय गीत है। 15 अगस्त, 26 जनवरी और अन्य राष्ट्रीय अवसरों पर दोनों का विशेष महत्व है।

आज ‘वंदे मातरम्’ का क्या महत्व है?

डेढ़ सदी से ज्यादा समय बाद भी ‘वंदे मातरम्’ भारतीय राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक है। 1875 में साहित्यिक रचना के रूप में सामने आया यह गीत 1896 में कांग्रेस के मंच तक पहुंचा, 1905 के स्वदेशी आंदोलन में स्वतंत्रता संघर्ष का नारा बना, क्रांतिकारियों के बीच लोकप्रिय हुआ और अंततः 24 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय पहचान के महत्वपूर्ण प्रतीकों में शामिल हो गया

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