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बंकिम चंद्र के वंशज ने पत्र लिखकर सोनिया गांधी से मांफी मांगने की मांग की

बंकिम चंद्र के वंशज ने पत्र लिखकर सोनिया गांधी से मांफी मांगने की मांग की

डिजिटल डेस्क : 80 वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कांग्रेस कार्यालय पर हुए मामले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद वंदेमातरम् पर विवाद खड़ा हो गया है। अब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के वंशजों ने सोनिया गांधी से माफी मांगने की मांग की है। भाजपा विधायक और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के सीधे वंशज सुमित्रो चटर्जी ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस पर ‘वंदे मातरम’ के पूरे मामले को लेकर हुई कथित घटना पर गहरा दुख जताया है। उन्होंने सोनिया गांधी से भारत के नागरिकों, विशेषकर पश्चिम बंगाल के लोगों से बिना शर्त माफी मांगने की अपील की।

चटर्जी ने अपने पत्र में ‘वंदे मातरम’ के ऐतिहासिक महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका का उल्लेख करते हुए अरबिंदो, खुदीराम बोस, बिपिन चंद्र पाल, सरला देवी चौधरानी, बाल गंगाधर तिलक और रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़े कई ऐतिहासिक प्रसंग भी गिनाए। अपने पत्र में चटर्जी ने लिखा कि जब देश स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ मना रहा था और ‘पूरा देश मातृभूमि की पूजा में लीन था’, उस समय अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी मुख्यालय में हुई घटनाएं ‘न केवल दुर्भाग्यपूर्ण थीं, बल्कि एक ऐतिहासिक गलती को बेशर्मी से दोहराना थीं।’ जब कांग्रेस कार्यकर्ता ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण गा रहे थे, तब सोनिया गांधी की ‘स्पष्ट बेचैनी, नाराजगी और इसे रोकने की बार-बार की कोशिशों’ ने उन्हें बेहद दुखी किया।

वंदेमातरम् के महत्व का किया जिक्र

चटर्जी ने पत्र में लिखा है कि एक आम भारतीय नागरिक, एक देशभक्त और सबसे बढ़कर, ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के परिवार का सीधा वंशज होने के नाते, मैं आज गहरे दर्द, खालीपन और दुख के साथ यह पत्र लिख रहा हूं। वंदे मातरम के ऐतिहासिक महत्व का जिक्र करते हुए चटर्जी ने अरबिंदो का हवाला दिया। लिखा कि अरबिंदो ने वंदे मातरम को केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि ‘देशभक्ति का धर्म’ बताया था। चटर्जी ने कहा कि इस मंत्र ने खुदीराम बोस समेत अनगिनत निडर क्रांतिकारि थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में ‘वंदे मातरम’ की भूमिका को भी रेखांकित किया। राष्ट्रवादी नेता बिपिन चंद्र पाल का हवाला देते हुए कहा कि बंगाल विभाजन के बाद यह गीत हर क्रांतिकारी की जुबान पर था। ‘स्वदेशी’, ‘बहिष्कार’ और ‘वंदे मातरम’ आजादी की लड़ाई के जीवंत प्रतीक बन गए थे।

1896 से लेकर 1938 तक प्रसंगों को भी दिलाया याद

चटर्जी ने 1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन में सरला देवी चौधरानी द्वारा पूरा गीत गाए जाने का भी उल्लेख किया। उन्होंने 1909 में राजद्रोह के मुकदमे के दौरान बाल गंगाधर तिलक को उनके समर्थकों द्वारा ‘वंदे मातरम’ गाते हुए सुनाए जाने और 1938 में उस्मानिया यूनिवर्सिटी में हुए राष्ट्रवादी छात्र आंदोलन का भी जिक्र किया। 1896 में कलकत्ता में हुए इंडियन नेशनल कांग्रेस के अधिवेशन का भी उल्लेख किया, जहां रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम’ गाया था। उन्होंने टैगोर के उन शब्दों को भी दोहराया, जिनमें उन्होंने इस गीत के ‘जादुई शब्दों’ का जिक्र करते हुए कहा था कि इनमें बाधाओं को तोड़ने और लोगों के दिलों को छूने की शक्ति है।यों को फांसी के फंदे का सामना करने और हंसते-हंसते मौत को गले लगाने के लिए प्रेरित किया। आज, स्वतंत्र भारत की धरती पर उसी मंत्र वंदे मातरम के पूरे पाठ के प्रति आपकी असहिष्णुता लाखों शहीदों के बलिदान का गंभीर अपमान लगती है।