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सत्य निकेतन हादसा : दो मृतकों के कॉर्निया किए गए दान

सत्य निकेतन हादसा : दो मृतकों के कॉर्निया किए गए दान

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली : सत्य निकेतन हादसे में जान गंवाने वाले दो लोगों के स्वजनों ने गहरे दुख के बीच मानवता की मिसाल पेश करते हुए उनके कॉर्निया दान करने का निर्णय लिया। परिजनों की सहमति से दोनों मृतकों के कॉर्निया सुरक्षित किए गए हैं। इससे जरूरतमंद दृष्टिहीन मरीजों को भविष्य में रोशनी मिलने की उम्मीद जगी है।

इनमें मध्य प्रदेश के देवास जिले के रहने वाले करीब 19 वर्षीय छात्र अर्पित जय भी शामिल हैं। अर्पित के स्वजनों ने दुख की इस घड़ी में उनका कॉर्निया दान करने की सहमति दी। दूसरे मृतक के कॉर्निया भी परिजनों की सहमति से सुरक्षित किए गए हैं, हालांकि एम्स प्रशासन ने अभी दूसरे दानदाता का नाम सार्वजनिक नहीं किया है।

परिजनों की सहमति से पूरी हुई प्रक्रिया

एम्स की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, सत्य निकेतन हादसे के बाद दोनों मृतकों के स्वजनों से कॉर्निया दान के संबंध में सहमति ली गई। सहमति मिलने के बाद चिकित्सकों ने निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी करते हुए दोनों के कॉर्निया सुरक्षित किए।

अब इन कॉर्निया की आवश्यक जांच की जाएगी। चिकित्सकीय मानकों के अनुरूप पाए जाने पर इन्हें ऐसे मरीजों में प्रत्यारोपित किया जा सकेगा, जिन्हें इसकी जरूरत है। इस तरह हादसे में जान गंवाने वाले दोनों लोगों के परिवारों का यह फैसला दूसरे जरूरतमंद लोगों के जीवन में नई रोशनी लाने का माध्यम बन सकता है।

मृत्यु के बाद सीमित समय में जरूरी होती है प्रक्रिया

चिकित्सकों के अनुसार, मृत्यु के बाद कॉर्निया को निर्धारित समय सीमा के भीतर सुरक्षित करना जरूरी होता है। इसके लिए मृतक के स्वजनों की सहमति अहम होती है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद सुरक्षित किए गए कॉर्निया की चिकित्सकीय जांच की जाती है और उपयुक्त पाए जाने पर जरूरतमंद मरीजों में प्रत्यारोपण किया जाता है।

दुख के बीच मानवता की मिसाल

सत्य निकेतन हादसे ने कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है। ऐसे कठिन समय में अर्पित जय समेत दो मृतकों के परिवारों द्वारा कॉर्निया दान का निर्णय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। अपने प्रियजनों को खोने के बावजूद परिजनों ने उनके अंगों के माध्यम से किसी जरूरतमंद के जीवन में रोशनी की उम्मीद कायम रखने का फैसला किया।

एम्स के मुताबिक, दोनों मृतकों के कॉर्निया सुरक्षित किए जा चुके हैं और आगे की चिकित्सकीय प्रक्रिया के बाद योग्य मरीजों में इनके प्रत्यारोपण की संभावना है।