डिजिटल डेस्क , लखनऊ : अलीगंज अग्निकांड मामले में हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को मुआवजे की नीति बनाने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि अलग-अलग घटनाओं में अलग राशि देना भेदभावपूर्ण,15 मृतकों के परिजनों को दिया गया करीब 11- 11 लाख रुपए मुआवजा। पीड़ितों ने इस मुआवजे को अपर्याप्त बताया है। घायल जयंत के इलाज का पूरा जिम्मा केजीएमयू और सरकार उठाएं।
अलीगंज के भीषण अग्निकांड में मुआवजे को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक आपदा से घटनाओं में सरकार की ओर से दिए जाने वाले मुआवजे के लिए स्पष्ट नीति होने चाहिए। कोर्ट अलग-अलग घटनाओं में अलग-अलग राशि दिए जाने से भेदभाव और मनमानी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। प्राकृतिक आपदाओं से इतर मामलों में मुआवजा देने के लिए नीति तैयार करने के पहलू पर विचार करे सरकार। सरकार जब भी किसी घटना में बिना वैधानिक प्रावधान के मुआवजा देती है तो उसके निर्धारण और भुगतान के लिए निश्चित मापदंड होने चाहिए – हाई कोर्ट।
हाईकोर्ट लखनऊ बेंच ने शिवेंद्र पांडे की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया है। पीड़ित परिवारों को दी गई मुआवजा राशि अपर्याप्त क्यों न मानी जाए और उसे बढ़ाया क्यों न जाए – हाई कोर्ट सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि अलीगंज अग्निकांड में मृत प्रत्येक व्यक्ति के परिवार को अलग-अलग स्रोतों से करीब 11 से 12 लाख रुपए की सहायता दी गई । इसमें मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोर्ट से 5 लाख ,राज्य आपदा मोचन निधि से चार लाख और प्रधानमंत्री राहत कोष से 2 लाख रुपए शामिल हैं। हालांकि पीड़ित परिवारों की ओर से कोर्ट को बताया गया कि कुछ परिवारों को प्रधानमंत्री राहत कोष से मिलने वाले 2 लाख रुपए अभी प्राप्त नहीं हुए। हाईकोर्ट ने सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता से इस संबंध में तथ्य स्थापित करने को कहा है ।
इलाज पर 70 हजार रुपए हर महीने खर्च
सुनवाई के दौरान अग्निकांड में घायल 25 वर्षीय जयंत गुप्ता का मामला भी सामने आया। पीड़ित परिवार की ओर से बताया गया की जयंत गंभीर रूप से घायल और दिव्यांग है जयंत का किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में उपचार चल रहा है । उसके इलाज पर करीब 70 हजार रुपए हर महीने खर्च हो रहे हैं जबकि उसे अब तक केवल 50 हज़ार रुपए मुआवजा मिला है। जयंत की हालत पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा प्रथम दृष्टया घटना के लिए केवल भवन स्वामी की चूक ही नहीं बल्कि संबंधित सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में हैं। क्योंकि कथित रूप से भवन को अवैध तरीके से कमर्शियल इस्तेमाल में लाने की अनुमति दी है।
हाई कोर्ट ने कहा कि कम से कम घायल जयंत के इलाज के बिलों का भुगतान राज्य सरकार को करना चाहिए। कोर्ट ने केजीएमयू को निर्देश दिया कि जयंत से उपचार का कोई खर्च न लिया जाए यदि उपचार पर कोई खर्च आता है तो उसे राज्य सरकार से मांगा जाए और राज्य सरकार उसका भुगतान सुनिश्चित करे। सुनवाई के दौरान पीड़ितों की ओर से दायर हस्तक्षेप आवेदन में मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए अतिरिक्त मुआवजे की मांग की गई है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को भवन मलिक को विपक्षी पक्षकार बनाने की अनुमति दी और उसे नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने अपर महाधिवक्ता के पास सील बंद लिफाफे में उपलब्ध एसओपी को जरूरत पड़ने पर पेश करने को कहा।

